श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के सत्तारूढ़ दल नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के भीतर आंतरिक कलह और गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के ही विधायक जावेद इकबाल चौधरी ने उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए उन पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और जनता का भरोसा तोड़ने की बात कही है।
उपमुख्यमंत्री पर 'तानाशाही और विश्वासघात' का आरोप
राजौरी जिले की बुढ़ाल विधानसभा सीट से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक जावेद चौधरी ने उपमुख्यमंत्री के रवैये को 'तानाशाही और निरंकुश' करार दिया है। उन्होंने मंगलवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद उपमुख्यमंत्री ने फंड आवंटन में सुधार करने के बजाय उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से हाथ मिला लिया। जावेद चौधरी के मुताबिक, यह न केवल मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना है, बल्कि जनता के विश्वास के साथ भी बड़ा विश्वासघात है।
मुख्यमंत्री के निर्देशों को ठंडे बस्ते में डाला
विधायक जावेद चौधरी ने एक हालिया बैठक का हवाला देते हुए बताया कि 3 जून को दाचीगाम में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इस बैठक में मुख्यमंत्री ने उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी को फंड आवंटन सहित अन्य प्रशासनिक मामलों में आ रही गड़बड़ियों और पक्षपात की शिकायतों को तुरंत दूर करने के सख्त निर्देश दिए थे। जावेद का आरोप है कि गलतियों को सुधारने के बजाय उपमुख्यमंत्री ने उनके विरोधियों से साठगांठ कर ली, ताकि उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले विधायकों को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाया जा सके।
फंड मोड़ने और निष्कासन की धमकी देने के संगीन आरोप
विधायक ने उपमुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए दो और बड़े आरोप लगाए:
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फंड का एकतरफा आवंटन: जावेद चौधरी ने दावा किया कि राजौरी जिले के अधिकांश विकास कार्यों के लिए तय किए गए बजट को उपमुख्यमंत्री ने नियमों को ताक पर रखकर अकेले अपने विधानसभा क्षेत्र 'नौशेरा' की तरफ मोड़ दिया है।
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पार्टी से निकालने की धमकी: उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो भी विधायक उपमुख्यमंत्री की इस कार्यशैली या पक्षपात के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है, सुरिंदर चौधरी उसे नेशनल कॉन्फ्रेंस से निष्कासित (बाहर) कराने की सीधी धमकी देते हैं।
सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर मंत्रियों और विधायकों के बीच शुरू हुई इस जुबानी जंग ने जम्मू-कश्मीर की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी पार्टी के भीतर की इस गुटबाजी को शांत करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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