ईरानी तेल पर नरम पड़ा अमेरिका, प्रतिबंधों से मिली अस्थायी राहत

तेहरान। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी तनाव के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रमुख कड़े प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील देने का बड़ा फैसला किया है। अमेरिकी प्रशासन ने इसके लिए 60 दिनों के लिए एक विशेष लाइसेंस जारी किया है। इस छूट के तहत 21 अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन, बिक्री, उनके परिवहन (शिपिंग) और इससे जुड़े तमाम वित्तीय लेनदेन (बैंकिंग ट्रांजैक्शन) को वैध अनुमति दे दी गई है।

तनाव कम करने के लिए अंतरिम व्यवस्था

यह महत्वपूर्ण कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच शांति, क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दों पर गुप्त और द्विपक्षीय बातचीत चल रही है। इस उच्च स्तरीय वार्ता में दोनों देशों के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही जैसे गंभीर विषयों पर गहन चर्चा हो रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका द्वारा दी गई यह राहत किसी स्थायी समझौते का हिस्सा नहीं है, बल्कि कूटनीतिक बातचीत को बिना किसी कड़वाहट के आगे बढ़ाने और दोनों देशों के बीच बने युद्ध के माहौल (तनाव) को कम करने के लिए एक अंतरिम (कामचलाऊ) व्यवस्था है।

वैश्विक तेल बाजार में आई गिरावट

अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury Department) ने इस फैसले पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। विभाग का कहना है कि यह विशेष छूट 21 अगस्त तक ही प्रभावी रहेगी और इसके बाद प्रतिबंधों को आगे बढ़ाना या हटाना पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि स्विट्जरलैंड में चल रही वार्ताओं की प्रगति कैसी रहती है। इस बड़े फैसले का सीधा और तत्काल असर वैश्विक ऊर्जा और तेल बाजार पर देखने को मिला है। प्रतिबंधों में ढील की घोषणा होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। बाजार के निवेशकों और विश्लेषकों को उम्मीद है कि इस छूट के बाद वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की आपूर्ति (सप्लाई) तेजी से बढ़ेगी, जिससे कच्चे तेल के दाम नियंत्रित रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बातचीत सफल रही, तो न केवल मध्य पूर्व का संकट टलेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी बड़ी स्थिरता मिलेगी।