नई दिल्ली: विपक्षी दलों में लगातार हो रही बड़ी राजनीतिक टूट ने केंद्र की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। इस सियासी फेरबदल से सरकार के भीतर यह भरोसा काफी बढ़ गया है कि अगले महीने शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र तक वे संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा आसानी से हासिल कर लेंगे। एक मीडिया रिपोर्ट में एक केंद्रीय मंत्री के हवाले से दावा किया गया है कि सरकार को पूरा विश्वास है कि मॉनसून सत्र के आगाज तक महिला आरक्षण को लोकसभा और विधानसभा सीटों के नए परिसीमन से जोड़ने वाले इस बेहद महत्वपूर्ण विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटा लिया जाएगा।
दो बड़े ऐतिहासिक विधेयकों को पास कराने की तैयारी
केंद्र सरकार संसद के आगामी सत्र में दो बेहद अहम संविधान संशोधन विधेयकों को हरी झंडी दिखाने की पूरी तैयारी में है, जिन्हें कानून बनाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत मिलना अनिवार्य है। इसके तहत देश में महिला आरक्षण की व्यवस्था को लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और उनकी सीमाओं को दोबारा तय करने (परिसीमन) की प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही, बीजेपी साल 2029 के आम चुनाव से काफी पहले पूरे देश में 'एक देश, एक चुनाव' यानी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का कानून बनाना चाहती है। रणनीतिकारों का मानना है कि एक साथ चुनाव होने से पार्टी को राज्य के चुनावों में भी राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव जैसे बड़े मुद्दों पर सीधे वोट मांगने का फायदा मिलेगा।
जादुई आंकड़े का गणित और विपक्ष में बगावत के संकेत
वर्तमान में 540 की प्रभावी संख्या वाली लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी कम से कम 360 वोटों की आवश्यकता है। फिलहाल लोकसभा में एनडीए की अपनी ताकत 293 सीटों की है। रणनीतिकारों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 बागी सांसदों और शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 बागी सांसदों के पाला बदलने की उम्मीद है, जिससे यह आंकड़ा 319 तक पहुंच सकता है। हालांकि यह संख्या अभी भी 360 के लक्ष्य से थोड़ी दूर है, लेकिन शीर्ष नेताओं का दावा है कि वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि 37 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी समेत कई अन्य विपक्षी दलों में भी अगले कुछ हफ्तों में बड़ी बगावत देखने को मिल सकती है। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में विपक्ष के भीतर कुछ ऐसे बड़े राजनीतिक उलटफेर होंगे जो उनकी ताकत को काफी कम कर देंगे।
सीटों के समीकरण बदलने का डर और सरकार का तर्क
दूसरी तरफ, विपक्ष को यह बड़ा डर सता रहा है कि पूरे देश में होने वाला यह नया परिसीमन सत्तारूढ़ दल को एक स्थायी और मजबूत बढ़त दे सकता है। विपक्षी दल इसके लिए असम में हुए परिसीमन का उदाहरण दे रहे हैं, जहां कुछ खास आबादी वाले क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह बदला गया जिससे विपक्ष की पारंपरिक सीटों का पूरा गणित ही बिगड़ गया। लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी सरकार पर राजनीतिक फायदे के लिए विपक्षी नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों को मनमाने ढंग से बदलने का सीधा आरोप लगाया था। हालांकि, सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती आई है। सरकार का तर्क है कि साल 1971 की जनगणना के बाद से देश की आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसके बावजूद लोकसभा की सीटें नहीं बढ़ाई गई हैं, इसलिए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए यह सुधार अब बेहद जरूरी हो चुका है।

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