आनंदीबेन पटेल का निर्देश, आयोग चयनित प्राचार्यों पर मनमानी नहीं चलेगी

बरेली। उत्तर प्रदेश के राजकीय व राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति एवं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने रोहिलखंड विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले प्रतिष्ठित बरेली कॉलेज की प्रबंध समिति (मैनेजमेंट कमेटी) को एक बड़ा झटका दिया है। कुलाधिपति ने कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओपी राय की परिवीक्षा अवधि (प्रोबेशन पीरियड) को आगे बढ़ाने के प्रबंध समिति के विवादित निर्णय को पूरी तरह से गैर-कानूनी और शून्य घोषित करते हुए निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही, राजभवन ने इस पूरे प्रकरण में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह द्वारा पूर्व में लिए गए निर्णय को वैधानिक मानते हुए उस पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है।

प्रबंध समिति की कार्रवाई को बताया दुर्भावनापूर्ण और नियम विरुद्ध

मामले के विवरण के अनुसार, प्रो. ओपी राय के सेवाकाल के संदर्भ में कॉलेज की प्रबंध समिति ने नियमों को ताक पर रखकर, अत्यंत अनियमित और गैर-विधिक (अवैध) तरीके से उनकी परिवीक्षा अवधि को दोबारा एक वर्ष के लिए विस्तारित करने का प्रयास किया था।

शैक्षणिक नियमावली और प्रशासनिक कानूनों के मुताबिक, किसी भी अशासकीय सहायता प्राप्त कॉलेज की प्रबंध समिति के पास उच्च शिक्षा सेवा आयोग द्वारा विधिवत चयनित होकर आए स्थायी प्राचार्य की परिवीक्षा अवधि में फेरबदल करने या उसे बढ़ाने का कोई कानूनी अधिकार सुरक्षित नहीं है। इस प्रकार की एकतरफा कार्रवाइयों का एकमात्र उद्देश्य संस्था के प्रशासनिक प्रमुख (प्राचार्य) को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और उनके दैनिक शैक्षणिक कार्यों में अनुचित गतिरोध पैदा करना होता है।

कुलपति के फैसले पर राजभवन की अंतिम स्वीकृति

इस प्रशासनिक विवाद को देखते हुए रोहिलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह ने 2 नवंबर 2023 को ही एक आधिकारिक आदेश जारी कर दिया था। कुलपति ने अपने आदेश में बरेली कॉलेज प्रबंध समिति के इस कृत्य को पूरी तरह से मनमाना, विधि-विरुद्ध और अधिकार क्षेत्र से बाहर पाते हुए तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया था।

अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राज्यपाल) द्वारा 11 जून को जारी नवीनतम आदेश के जरिए कुलपति के उस साहसिक फैसले को न्यायसंगत ठहराया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन सदैव अपने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले महाविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता, स्थापित नियमों की अक्षरशः पालना और प्राचार्यों की गरिमा व अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह से संकल्पित है।

प्रबंधकीय दबाव के चलते प्राचार्यों का इस्तीफा एक गंभीर चिंता

उद्यमी और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश शासन द्वारा उच्च शिक्षा सेवा आयोग के माध्यम से प्रदेश भर के विभिन्न महाविद्यालयों में लगभग 290 योग्य प्राचार्यों की नियुक्तियां की गई थीं। परंतु, यह एक कड़वी हकीकत है कि इनमें से करीब 40 से 50 फीसदी प्राचार्यों को स्थानीय प्रबंधन समितियों की आंतरिक राजनीति, अनावश्यक हस्तक्षेप, अनुचित दबाव और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इसी असहज वातावरण और विभिन्न व्यक्तिगत व प्रशासनिक कारणों के चलते कई प्राचार्यों को समय से पहले ही अपने गरिमामयी पदों से त्यागपत्र (इस्तीफा) देने के लिए विवश होना पड़ा है। राजभवन का यह ताजा फैसला भविष्य में प्राचार्यों के कार्यस्थल की सुरक्षा के लिहाज से एक नजीर साबित होगा।