नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते की खबर आते ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का दौर शुरू हो गया है। इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का सीधा असर 15 जून को भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिला, जहां अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 95.11 से मजबूत होकर 94.65 के स्तर पर आ गया, जो बीते मई महीने के बाद का इसका सबसे शानदार स्तर है। इस मजबूती के कारण देश के शेयर बाजार में भी जोरदार रौनक रही और सेंसेक्स-निफ्टी में लगभग 2 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया, जिससे तेल, गैस, बैंकिंग और आईटी सेक्टर के शेयरों को बड़ा सहारा मिला है।
पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में राहत की उम्मीद
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से घटकर अब 84 डॉलर के करीब आ चुकी हैं, जिससे तेल कंपनियों की लैंडेड कॉस्ट में बड़ी कमी आएगी। हालांकि, जून के शुरुआती हफ्ते में ही देश में ईंधन के दामों में बढ़ोतरी की गई थी, इसलिए इस वैश्विक गिरावट का सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को मिलने में कम से कम दो से चार हफ्तों का वक्त लग सकता है। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि जुलाई के प्रथम सप्ताह में होने वाली मूल्य समीक्षा के दौरान तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दामों में 4 से 5 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर सकती हैं, जबकि सऊदी सीपी में मंदी आने से घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी 30 से 50 रुपये तक की कमी देखने को मिल सकती है।
सप्लाई चेन की बहाली और नए सामान्य स्तर का आकलन
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल का परिवहन पूरी तरह बहाल होने और अमेरिकी प्रतिबंधों के हटने की प्रक्रिया में एक से तीन महीने का समय लगेगा। हालांकि, भू-राजनीतिक बदलावों और बदली हुई सप्लाई चेन के कारण चालू वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल के 92-95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही बने रहने के आसार हैं, जिससे फरवरी 2026 के पुराने स्तरों (96 रुपये प्रति लीटर) पर लौटना मुमकिन नहीं होगा और वर्तमान की 102-108 रुपये की रेंज ही नया सामान्य स्तर बन जाएगी। तेल के ऊंचे दामों की वजह से भारत का वार्षिक तेल आयात बिल भी बढ़कर 180 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका है, जो युद्ध से पहले के दौर में महज 70 अरब डॉलर के आसपास हुआ करता था।
घरेलू बाजार में महंगाई से मुक्ति के तीन चरण और अड़चनें
ईंधन की दरों में नरमी आने से देश की थोक और खुदरा महंगाई पर लगाम कसने की उम्मीद बंधी है, जो मई 2026 में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार, यदि तेल की कीमतें 80-85 डॉलर के दायरे में स्थिर रहती हैं, तो सालाना औसत खुदरा महंगाई का अनुमान 5.1 फीसदी से घटकर 4.5 से 4.8 प्रतिशत के बीच आ सकता है, जिसका लाभ आम जनता को तीन चरणों में (कमोडिटी के दाम घटने, उत्पादन लागत कम होने और अंततः त्योहारी सीजन तक पैकेज्ड फूड व कपड़ों के सस्ते होने के रूप में) मिलेगा। हालांकि, यह पूरी राहत आगामी 19 जून से शुरू होने वाली 60 दिनों की ईरान परमाणु वार्ता की सफलता, इजरायल-हिजबुल्लाह तनाव के नियंत्रण और सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी न बढ़ाए जाने जैसी नाजुक वैश्विक अड़चनों पर टिकी हुई है।

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