नई दिल्ली | भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक चुनौतियों के बीच भी शानदार प्रदर्शन करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7 प्रतिशत की मजबूत विकास दर दर्ज की है। हालांकि, जनवरी-मार्च की अंतिम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की बेहतरीन वृद्धि के उपरांत, वित्तीय विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल के बढ़ते दाम और वैश्विक अस्थिरता के चलते चालू वित्त वर्ष (2026-27) में आर्थिक प्रगति की यह गति कुछ मंद हो सकती है।
औद्योगिक विनिर्माण और चौतरफा उत्पादन से मिली ताकत
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में जीडीपी की रफ्तार उम्मीद से कहीं बेहतर रही। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रगति पिछले कई तिमाहियों के औसत प्रदर्शन से काफी आगे है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की आंतरिक मजबूती को दर्शाती है। बाजार जानकारों के अनुसार, इस अवधि में सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) दर 7.9 प्रतिशत पर पहुंचना यह प्रमाणित करता है कि देश का आर्थिक विस्तार केवल उपभोक्ता मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग), बुनियादी ढांचा निर्माण और सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) के दमदार उत्पादन का भी इसे पूरा सहयोग मिला है।
नीतिगत रणनीतियों और घरेलू निवेश से सुरक्षित रहा बाजार
मार्च के महीने में जब मध्य पूर्व का संकट अपने चरम पर था, तब केंद्र सरकार ने देश के भीतर ईंधन (पेट्रोल-डीजल) की कीमतों को नियंत्रित और स्थिर रखकर इसके नकारात्मक आर्थिक प्रभाव को काफी हद तक थाम लिया। बैंकिंग क्षेत्र के शोध बताते हैं कि इस आर्थिक उछाल को बनाए रखने में निजी उपभोक्ता खर्च और घरेलू निवेश में आई भारी तेजी ने मुख्य भूमिका निभाई है। इसके अलावा, विदेशी पूंजी निवेश के प्रवाह को सुगम बनाने और कर प्रणालियों में सुधार के सरकारी प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय झटकों के खिलाफ भारतीय बाजारों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का काम किया।
आगामी जोखिम और वित्तीय वर्ष 2027 का परिदृश्य
आने वाले समय को लेकर आर्थिक रेटिंग एजेंसियों और प्रमुख बैंकों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया है। चालू वित्त वर्ष (2026-27) के लिए विकास दर का अनुमान 6.5 से 6.6 प्रतिशत के बीच लगाया जा रहा है, जो इस कयास पर टिका है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मंद वैश्विक विकास, आपूर्ति शृंखला में बाधाएं, बढ़ती उत्पादन लागत और मानसून की अनिश्चितता आने वाले दिनों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण से बाहर होती है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसा कड़ा कदम भी उठाना पड़ सकता है, हालांकि मजबूत आंतरिक मांग और सरकार का पूंजीगत व्यय कार्यक्रम इस मंदी को रोकने में मददगार साबित होगा।

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