चंडीगढ़ | पंजाब नगर निकाय चुनाव के हालिया नतीजे राज्य की राजनीति को लेकर कई बड़े संकेत दे रहे हैं। चुनावी इतिहास के मुताबिक, पंजाब के समझदार मतदाताओं ने इस बार भी सत्ताधारी दल के पक्ष में मतदान कर विकास की रफ्तार को दोगुना करने का फैसला किया है। हालांकि, इन जमीनी स्तर के चुनावों के नतीजों का दूसरा पहलू यह भी दिखाता है कि आगामी विधानसभा चुनाव का मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय होने वाला है। इस बार के जनादेश ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
भाजपा ने सुधारी स्थिति, विरोधियों को दी कड़ी चुनौती
पंजाब में लंबे समय से अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए ये नतीजे काफी सकारात्मक रहे हैं। पार्टी की सोची-समझी रणनीति का असर नतीजों में साफ देखा जा सकता है। जहां साल 2021 के निकाय चुनावों में भाजपा महज 49 सीटों पर सिमट गई थी, वहीं इस बार पार्टी ने कुल 1977 सीटों में से 167 सीटों पर शानदार जीत हासिल की है। इतना ही नहीं, भाजपा ने सूबे के आठ नगर निगमों में से दो पर अपना परचम लहराया है। यह सफलता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि तमाम विपरीत परिस्थितियों और कई नामांकन रद्द होने के बाद भाजपा केवल 316 सीटों पर ही चुनाव लड़ सकी थी। इस प्रदर्शन से भाजपा ने साफ कर दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उसे कमजोर आंकना विपक्षी दलों के लिए एक बड़ी भूल साबित हो सकता है।
कांग्रेस का बिखरा गणित, शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची बात
लोकसभा चुनाव में सूबे की 13 में से 7 सीटें जीतकर उत्साह से भरी कांग्रेस को इन निकाय चुनावों में तगड़ा झटका लगा है। कांग्रेस के आला नेता यह मानकर चल रहे थे कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में चली सत्तारूढ़ दल की आंधी को रोक दिया है और शहरी व ग्रामीण मतदाताओं पर उनकी पकड़ मजबूत है। लेकिन साल 2026 के इन चुनावी नतीजों ने कांग्रेस के दावों की हवा निकाल दी। साल 2021 में रिकॉर्ड 1432 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार केवल 384 सीटों पर सिमट कर रह गई। पार्टी की इस करारी शिकस्त का मामला अब राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी तक पहुंच गया है, जिसके बाद हार के कारणों पर आत्ममंथन की तैयारी की जा रही है।
शिरोमणि अकाली दल का ग्राफ गिरा, निर्दलीयों को भी नुकसान
पंजाब की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने वाले शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का लचर प्रदर्शन इस चुनाव में भी जारी रहा। सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में पार्टी कोई विशेष करिश्मा दिखाने में नाकाम रही। साल 2021 में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद अकाली दल ने 284 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार उनका आंकड़ा घटकर 191 सीटों पर आ गया है। इसके अलावा, पिछले चुनाव में 364 सीटें जीतने वाले निर्दलीय प्रत्याशी भी इस बार 251 सीटों पर सिमट गए हैं। वहीं दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मामूली सुधार करते हुए अपनी सीटों की संख्या 5 से बढ़ाकर 7 कर ली है। बहरहाल, इन परिणामों के बाद सभी राजनीतिक दल अपनी कमियों को सुधारते हुए अगले विधानसभा चुनाव के लिए नए सिरे से रणनीति बनाने में जुट गए हैं।

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