भारत और नेपाल के बीच हालिया कूटनीतिक तनाव के बावजूद, भारत ने एक बार फिर 'पड़ोसी पहले' की नीति का परिचय दिया है। लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल सरकार के विवादित बयानों के बीच, भारत ने नेपाल में गहराते कृषि संकट को दूर करने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में उर्वरकों (खाद) की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं, जिससे नेपाल की खेती पर संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में भारत अपनी जरूरतों के लिए महंगी खाद खरीदने के बावजूद नेपाल को रियायती दरों पर खाद उपलब्ध करा रहा है।
लिपुलेख विवाद और नेपाल की दोहरी नीति
काठमांडू के मेयर बालेन शाह और नेपाल सरकार द्वारा लिपुलेख दर्रे पर हाल ही में दिए गए बयानों ने दोनों देशों के बीच पुराने सीमा विवाद को फिर से गरमा दिया है। कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग माना जाने वाला यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहा है, लेकिन नेपाल पिछले कुछ दशकों से इसे अपना क्षेत्र बताकर विरोध दर्ज कराता रहा है। हैरानी की बात यह है कि एक ओर नेपाल राजनीतिक स्तर पर भारत के खिलाफ मुखर है, वहीं दूसरी ओर देश में खाद की भारी किल्लत और बुवाई का सीजन नजदीक होने के कारण उसने भारत से ही गुहार लगाई है।
आर्थिक संकट और भारत के साथ 'जी-टू-जी' समझौता
नेपाल को अपनी वर्तमान खेती के लिए लगभग 2.5 लाख टन खाद की तत्काल आवश्यकता है, जबकि उसके पास महज 1.71 लाख टन का स्टॉक बचा है। नेपाल के कृषि मंत्रालय के अनुसार, यदि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे खाद खरीदते हैं, तो उन्हें लगभग 80 अरब रुपये की भारी सब्सिडी देनी होगी, जिसे वहन करना नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए असंभव है। इस संकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने भारत की 'राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड' के साथ 'जी-टू-जी' (सरकार से सरकार) समझौता किया है। इसके तहत भारत 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी की आपूर्ति करेगा।
वैश्विक महंगाई के बीच भारत की दरियादिली
ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतें 512 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 959 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई हैं। भारत स्वयं अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगभग दोगुनी कीमत चुकाकर खाद का आयात कर रहा है। इसके बावजूद, भारत ने 2022 में हुए द्विपक्षीय समझौते का सम्मान करते हुए नेपाल को पुराने और सस्ते दामों पर खाद देने की गारंटी दी है। भारत का यह कदम स्पष्ट करता है कि वह सीमा विवादों जैसे जटिल मुद्दों के बावजूद अपने पड़ोसी देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों को प्राथमिकता दे रहा है।

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