नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान तीखे सवाल उठाए हैं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक आपसी सहमति से बने रिश्तों में अलगाव को सीधे तौर पर 'अपराध' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
मामला: 15 साल का साथ और यौन उत्पीड़न का आरोप
यह सुनवाई मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर हो रही थी, जिसमें कोर्ट ने महिला के पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था। महिला का आरोप था कि पुरुष ने शादी का झूठा वादा कर उसका यौन शोषण किया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ:
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सहमति और अपराध: जस्टिस नागरत्ना ने पूछा, "जब रिश्ता 15 साल तक आपसी सहमति से चला और दोनों का सात साल का बच्चा भी है, तो इसमें अपराध का सवाल कहाँ उठता है?"
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लिव-इन का जोखिम: बेंच ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में बिना किसी कानूनी बंधन (शादी) के साथ रहने में एक अंतर्निहित जोखिम होता है। चूंकि कोई कानूनी विवाह नहीं हुआ, इसलिए किसी भी पक्ष द्वारा रिश्ता तोड़ देना स्वतः ही अपराध नहीं बन जाता।
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अधिकारों की स्थिति: कोर्ट ने तर्क दिया कि यदि शादी हुई होती, तो महिला के पास दूसरी शादी के खिलाफ केस करने या गुजारा-भत्ता (Maintenance) मांगने के मजबूत कानूनी अधिकार होते।
बच्चे के भविष्य पर जोर: सुलह की सलाह
अदालत ने आरोपी को जेल भेजने के बजाय बच्चे के भविष्य को प्राथमिकता देने की बात कही। कोर्ट ने सुझाव दिया:
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आर्थिक मुआवजा: पुरुष के जेल जाने से महिला को कुछ हासिल नहीं होगा, इसलिए बच्चे के पालन-पोषण के लिए वित्तीय मुआवजे या गुजारा-भत्ते पर ध्यान देना चाहिए।
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आपसी सुलह: बेंच ने दोनों पक्षों को बच्चे के हित में विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने का परामर्श दिया।

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