मदन द्वादशी से शुरू करें 13 द्वादशी व्रत, संतान प्राप्ति के लिए अद्भुत उपाय, दांपत्य जीवन होगा खुशहाल!

हिंदू धर्म में हर एकादशी का विशेष महत्व माना गया है. साल में 24 एकादशी व्रतों में से एक है कामदा एकादशी. लेकिन, आज बात एकादशी की नहीं, द्वादशी की है. कामदा एकादशी के ठीक अगले दिन पड़न वाली द्वादशी को मदन द्वादशी व्रत कहा जाता है. यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है. इस दिन कामदेव की विधि-विधान से पूजा का विधान है, जिन्हें मदन नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है. संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है.

कि जो श्रद्धा और विश्वास के साथ मदन द्वादशी का व्रत रखते हैं, उनके जीवन के दुख-दर्द दूर हो जाते हैं. खासतौर पर जिन दंपतियों को संतान सुख की इच्छा होती है, उनके लिए यह व्रत बेहद शुभ माना गया है. इसके साथ ही यह व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में खुशहाली लाने वाला भी माना जाता है. इसलिए भक्त इस दिन पूरे नियम और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं.
कब मनाई जाएगी मदन द्वादशी
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का प्रारंभ 29 मार्च को रविवार सुबह 07 बजकर 46 मिनट पर हो रहा है. इस तिथि का समापन 30 मार्च दिन सोमवार को सुबह 07 बजकर 09 मिनट पर होगा. ऐसे में सूर्योदय को आधार मानकर देखें तो मदन द्वादशी व्रत 30 मार्च को रखा जाएगा.
मदन द्वादशी का महत्व
मदन द्वादशी का व्रत विशेष रूप से योग्य और तेजस्वी पुत्र की कामना के लिए किया जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को लगातार 13 द्वादशी तक श्रद्धा और नियम से रखने पर मनोकामना पूरी होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं द्वारा राक्षस वंश का नाश हो गया, तब उनकी माता दिति अत्यंत दुखी हो गई थीं. अपनी संतानों के वियोग में व्याकुल दिति ने ऋषि-मुनियों की सलाह पर मदन द्वादशी व्रत का पालन किया. इस व्रत के प्रभाव से उनका शोक धीरे-धीरे समाप्त हुआ और उन्हें पुनः संतान सुख की प्राप्ति हुई. तभी से यह व्रत संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है.
इस विधि से करे पूजा?
मदन द्वादशी पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर लें. घर के पूजा स्थल को साफ कर लें और भगवान मदन की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा शुरू करें. पूजा में भगवान को फूल, फल, मिष्ठान और पंचामृत आदि अर्पित करें. फिर पूर्व या उत्तर दिशा में अपना मुख पूजा करें और भगवान के प्रति पूरी श्रद्धा रखें. इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम, नरसिंह स्तोत्र के साथ ही भगवान विष्णु की आरती कर पूजा को पूरा करें. भगवान को अर्पित किए भोग को परिवार में बांटें.