वॉशिंगटन। ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष और इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ते प्रतिकूल प्रभावों ने अमेरिकी राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। व्हाइट हाउस द्वारा युद्ध के लिए प्रस्तावित 200 बिलियन डॉलर (200 अरब डॉलर) से अधिक के अतिरिक्त वित्त पोषण अनुरोध ने रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही दलों के सांसदों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। इस भारी-भरकम बजट की मांग और युद्ध की अस्पष्ट समयसीमा को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में विभाजन गहरा गया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फंड की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है कि अमेरिकी सेना को अपनी सर्वोच्च शक्ति बनाए रखने के लिए संसाधनों की तत्काल जरूरत है। उनके अनुसार, वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर बने रहने के लिए यह एक छोटी कीमत है। हालांकि, उनकी अपनी ही पार्टी के भीतर अमेरिका फर्स्ट की नीति को लेकर विरोधाभास उभर रहा है। कोलोराडो की प्रतिनिधि लॉरेन बोएबर्ट और चिप रॉय जैसे रिपब्लिकन नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी अनंत युद्ध के लिए करदाताओं का पैसा खर्च करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका तर्क है कि जब देश के भीतर लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, तब विदेशी धरती पर अरबों डॉलर खर्च करना तर्कसंगत नहीं है।
खाड़ी क्षेत्र की स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण बनी हुई है। अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। जनरल डैन केन के अनुसार, ए-10 वारथॉग विमान और अपाचे हेलीकॉप्टर ईरानी नौसैनिक संपत्तियों और फास्ट-टैक जलयानों को निशाना बना रहे हैं ताकि महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों को खोला जा सके। इस सैन्य गतिविधि और बुनियादी ढांचे पर हमलों के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट का खतरा पैदा हो गया है। विपक्षी डेमोक्रेट नेता और कई वित्तीय संरक्षक अब इस बात पर अड़े हैं कि प्रशासन पहले यह स्पष्ट करे कि इस युद्ध का अंतिम लक्ष्य क्या है और क्या यह 200 अरब डॉलर की राशि आगे चलकर एक ट्रिलियन डॉलर में तो नहीं बदल जाएगी। सीनेट में बहुमत के नेता जॉन थ्यून ने भी बजट पास होने को लेकर अनिश्चितता जताई है। इस बीच, प्रशासन के भीतर ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील देने पर भी चर्चा हो रही है ताकि तेल की कीमतों को स्थिर किया जा सके, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे युद्ध के दौरान ईरान की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो सकती है। फिलहाल, वॉशिंगटन में इस युद्ध की लागत और नैतिकता पर छिड़ी यह बहस थमने का नाम नहीं ले रही है।

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