मां मंगला गौरी मंदिर में 600 साल से जल रही अखंड ज्योति, बिना बिजली के होते हैं दर्शन

गया जी। जिले में स्थित मां मंगला गौरी मंदिर आस्था, परंपरा और चमत्कारी मान्यताओं का अद्भुत संगम है। भस्मकूट पर्वत की चोटी पर स्थित यह प्राचीन मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और भी बढ़ जाती है। मंदिर की सबसे विशेष पहचान इसका गर्भगृह है, जहां सदियों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है। मान्यता है कि यह ज्योति लगभग 600 वर्षों से निरंतर जल रही है। खास बात यह है कि आज भी गर्भगृह में बिजली का उपयोग नहीं किया जाता और श्रद्धालु इसी दिव्य ज्योति के प्रकाश में माता के दर्शन करते हैं। यह परंपरा मंदिर को रहस्यमय और आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वही पवित्र स्थल है जहां माता सती का वक्ष स्थल गिरा था, इसलिए इसे ‘पालनपीठ’ भी कहा जाता है। वायु पुराण और पद्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक प्रामाणिकता को दर्शाता है।  कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर माता सती ने आत्मदाह किया, तो भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के टुकड़े किए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। गया जी में गिरा माता का वक्ष स्थल आज मां मंगला गौरी मंदिर के रूप में पूजित है। मंदिर के पुजारी परिवार के अनुसार, अखंड ज्योति की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी नियम और श्रद्धा के साथ इसका पालन किया जा रहा है। गर्भगृह में आधुनिक रोशनी का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है, जो इस मंदिर की अनूठी पहचान बन चुका है। सामान्य दिनों में भी यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। देश-विदेश से आने वाले भक्त यहां पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि मां मंगला गौरी अपने भक्तों के दुख दूर कर उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि यह मंदिर अटूट विश्वास, भक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।