ग्वालियर: भारत में अपनी सफलता की कहानी गढ़ रहे चीता पुनर्वास योजना की इबारत में 28 फरवरी 2026 का दिन एक नए अध्याय के साथ जुड़ गया है. शनिवार की सुबह करीब 9:30 नौ बजे के लगभग ग्वालियर एयरफोर्स बेस पर भारतीय वायु सेना का C17 ग्लोबलमास्टर हवाई जहाज उतरा, ये वो जहाज है जिसमें पहले भी दो बार चीते भारत आए हैं.
इसी में लकड़ी की क्रेट्स में लाए गए वो 9 विदेशी मेहमान थे जो अब भारत के इस महत्वपूर्ण चीता प्रोजेक्ट के नए सदस्य बन चुके थे. कुछ ही देर में अफ्रीकी देश बोत्सवाना से लाए गए इन चीतों को इंडियन एयर फोर्स के हेलीकॉप्टर से श्योपुर के कूनो नेशनल पार्क लाया गया. ये वो क्षण था जब कूनो नेशनल पार्क में विदेशी चीतों की तीसरी खेप पहुंची थी.
पिंजरे से मिली आजादी, अब बाड़े से निकलने का इंतज़ार
हेलीपैड पर उतरते ही अलग-अलग गाड़ियों में बोत्सवाना के मेहमानों को लोड किया गया. वन विभाग और चीता प्रोजेक्ट में शामिल कर्मचारियों और अधिकारियों की देख रेख में उन्हें उस बाड़े तक ले जाया गया जो आने वाले कुछ समय तक उनका नया घर होगा. ये एक क्वारेंटीन बाड़ा है जहां ये बोत्सवाना से आए 9 चीते विशेषज्ञों की देख रेख में तब तक रहेंगे जब तक की उनके लिए भारत और कूनो का वातावरण अनुकूल नहीं होता.इसके बाद इन्हें खुले जंगल में आजाद छोड़ दिया जाएगा. तीसरी खेप में क्वारंटीन बाड़े में पहले दो चीतों को केंद्रीय वन मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने हैंडल घुमाकर बाड़े में छोड़ा. इसके बाद कूनो के विशेषज्ञों ने आगे की कमान संभाली और अन्य चीतों को भी बाड़े में शिफ्ट कर दिया गया. इस तरह विदेश से भारत की धरती पर तीसरी बार चीतों का सफल पुनर्वास जो गया है.
मध्य प्रांत में दिखे थे आखिरी चीते
अब बात करते हैं इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की, असल में भारत की धरती पर इस प्रोजेक्ट से पहले आख़िरी बार चीतों को 1947 में देखा गया था. तब तीन चीतों को शिकार करने के लिए गोली मार दी गई थी. ये घटनाक्रम उस वक्त के मध्यप्रांत (आज का छतीसगढ़) के कोरिया में हुई थी. पांच साल बाद 1952 में सरकार ने भारत में मूल एशियाई चीतों की विलुप्ति की अधिकारिक घोषणा कर दी.
पहले भी हुई थी विदेश से चीते लाने की कोशिश
इसके बाद 70 के दशक से चीतों को बाहरी देशों से लाकर भारत में बसाने पर योजना बनाने की शुरुआत हुई. 1970 में ईरान को पहला प्रपोजल भेजा गया जो नाकाम हुआ. इसके बाद 1980 में हुई केन्या से बातचीत भी विफल रही. लेकिन चीता प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने का काम 2022 में जाकर पूरा हुआ. जब 17 सितंबर 2022 को चीतों के लिए मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क को चीतों का नया घर बनाया गया.
सात दशक बाद भारत में चीतों की वापसी
इस दिन 70 साल बाद पहली बार 17 सितंबर 2022 को भारत की धरती पर अफ्रीकी देश नामीबिया से 8 चीतों की पहली खेप पहुची. 8 चीते, जिनमें 5 मादाएं और 3 नर चीते थे. इन्हें कूनो नेशनल पार्क में बनाये एक खास बाड़े में क्वारंटीन किया गया. इसके बाद अगली खेप 18 फरवरी 2023 को 12 चीतों की दक्षिण अफ्रीका से भारत पहुंची इसमें 5 मादा और 7 नर चीते शामिल थे. इसके साथ ही भारत में फरवरी 2023 तक 20 विदेशी चीते आ चुके थे. तीसरी खेप 28 फरवरी 2026 को 9 चीतों की बोत्सवाना से भारत पहुंची.
भारत में चीतों का जन्म, कूनो में गूंजी खुशियां
मार्च 2023 में नामीबिया से भारत लाई गई मादा चीता ज्वाला ने भारत की धरती पर जन्मे पहले शावक समूह को जन्म दिया. पहले प्रजनन में ज्वाला ने 4 शावकों को जन्म दिया जिनमें पहली शावक मुखी भी शामिल है. इसके बाद 3 जनवरी 2024 को नामीबियाई चीता आशा ने 3 शावकों को जन्म दिया. इसके कुछ दिन बाद ही जनवरी 2024 में ही एक बार फिर मादा चीता ज्वाला ने 4 शावकों को जन्म दिया. इसके बाद मार्च 2024 में दक्षिण अफ्रीका से आई मादा चीता गामिनी ने 6 शावकों को जन्म दिया.फिर नामीबिया की मादा निरवा ने नवंबर 2024 में दो शावकों को जन्म दिया, नामीबिया की चीता वीरा ने 2 शावकों को फरवरी 2025 में जन्म दिया, इसके बाद एक बार फिर मादा चीता निरवा अप्रैल 2025 में 5 शावकों की मां बनी. नवंबर 2025 एतिहासिक समय था क्योंकि भारत में जन्मी पहली भारतीय चीता मुखी ने 5 शावकों को जन्म दिया. इसके बाद फरवरी 2026 में मादा चीता आशा ने 5 शवकों को जन्म दिया और हाल ही में 18 फरवरी 2026 को मादा चीता गामिनी ने एक बार फिर 4 शावकों को जन्म दिया है. इस तरह पिछले चार वर्षों में भारत की धरती पर 40 शावकों का जन्म हुआ.
खुले मैदान में चीतों की रफ्तार, बोत्सवाना चीतों को करना होगा इंतज़ार
डीएफओ आर थिरुकुरल ने बताया कि, ''चीता स्टेयरिंग कमिटी की मंजूरी के बाद कूनो के बाड़े से 4 दिसंबर 2024 को दो नर चीता अग्नि और वायु को जंगल में छोड़ा गया था. इसके बाद 6 फरवरी को प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 5 चीतों को रिलीज किया, जिनमें दो विदेशी मादा चीता आशा और धीरा जबकि 3 भारत में जन्मे शावक थे. इसके बाद 21 फरवरी को मादा चीता ज्वाला और उसके चार शावकों को जंगल में रिलीज किया गया था. 4 दिसंबर को मादा चीता वीरा और उसके दो शावकों को भी जंगल में छोड़ा गया था लेकिन सड़क दुर्घटना में उसके एक शावक की मौत हो गई जिसके बाद उन्हें वापस बाड़े में ले आया गया.
वहीं मादा चीता गामिनी और उसके दो शावकों को भी आजादी मिली थी लेकिन एक शावक की मौत हो गई. जबकि प्रजनन के बाद मादा गामिनी और उसके चार शावकों को बाड़े में वापस लाया गया. इस तरह भारत की धरती पर बिना बंधन 13 चीते अभी रफ़्तार से जमीन नाप रहे हैं. बाक़ी चीते और शावक बाड़ों में विशेषज्ञों की देख रेख में हैं.'' हालांकि उन्होंने बताया कि, ''बोत्सवाना से आए चीतों का क्वारंटीन पूरा होने के बाद चीता स्टीयरिंग कमेटी उनकी आज़ादी का फ़ैसला लेगी.''
चीता प्रोजेक्ट का सफरनामा
भारत में एशियाई चीतों का खात्मा 1947 को मध्य प्रदेश के सरगुजा (वर्तमान में छतीसगढ़ का हिस्सा) के तत्कालीन राजा रामानुज प्रताप सिंह देव द्वारा झुंड में बैठे आख़िरी तीन चीतों के शिकार से हुआ.
– 1950 में एक बार फिर चेतों को भारत लाने का प्रस्ताव बना. पहला प्रस्ताव 1970 में ईरान को भेजा गया.
-1980 में केन्या से चीता भारत लाने की चर्चा हुई जो विफल रही. 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने छोटो संख्या में चीतों को लाने की अनुमति दी.
– चीतों के रख रखाव और बसाहट के लिए मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क को चुना गया.
– 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से 8 चीतों को भारत लाया गया.
– 18 फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीतों की एक और खेप भारत लाई गई.
– नवंबर 2025 में भारत में जन्मी पहली शावक मुखी ने पांच शावकों को जन्मा, ये पहली भारतीय चीता से जन्मे शावक हैं.
– 28 फरवरी 2028 को दक्षिण अफ्रीकी देश बोत्सवाना से 9 चीतों की खेप कूनो पहुंची.
अब भारत में 48 चीते
चीता प्रोजेक्ट के इस सफर में कई उतार चढ़ाव आए. इस बीच कई शावक जन्मे तो कई चीतों की मौत भी हुई. लेकिन आज वर्तमान में जब चीतों की तीसरी खेप बोत्सवाना से भारत आ चुकी है तब भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 48 हो चुकी है. इनमें 28 भारत में जन्मे जीवित हैं और इन चीतों के भारत में दो घर हैं. पहला कूनो और दूसर गांधी सागर अभियारण्य, जहां हर दिन ये खुले आसमान के नीचे रफ़्तार नाप रहे हैं.

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