सामाजिक न्याय पर केंद्रित पुस्तक ‘अंजना’ का विमोचन कार्यक्रम संपन्न
भोपाल। मध्यप्रदेश के लेखक व पत्रकार अंकित पचौरी की दूसरी पुस्तक ‘अंजना’ का विमोचन रविवार को महाराष्ट्र के सेवाग्राम में विकास संवाद द्वारा आयोजित मैत्री मेला में किया गया। कार्यक्रम में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों पर काम कर रहे प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। ‘अंजना’ केवल एक घटना का विवरण नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना पर गहन प्रश्न है, जहाँ जन्म के साथ ही व्यक्ति की हैसियत तय कर दी जाती है। यह पुस्तक मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के ग्राम बरोदिया नोनागिर में घटित दलित हत्याकांड की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को संवेदनशीलता और तथ्यात्मकता के साथ दर्ज किया है। लेखक अंकित पचौरी ने बताया कि बरोदिया नोनागिर बाहर से एक सामान्य भारतीय गाँव जैसा दिखता है- मिट्टी की सोंधी गंध, सूखते तालाब, बारिश की राह ताकती फसलें, गलियों में खेलते बच्चे और चौपाल पर बैठे बुज़ुर्ग। लेकिन इसी सामान्यता के भीतर एक ऐसा ज़ख्म है, जो आज भी हरा है 24 वर्ष की अंजना अहिरवार की अधूरी कहानी, जिसने बचपन से अपमान, भेदभाव और अन्याय झेला।

पुस्तक की विशेषताएँ
160 पृष्ठों की यह कृति बताती है कि अंजना की मौत केवल एक बेटी का अंत नहीं थी, बल्कि उस सपने का भी अंत थी, जो उसने अपने परिवार के लिए देखा था। पुस्तक पुलिस-प्रशासन और अदालतों के बीच भटकते एक दलित परिवार की उस यात्रा को सामने लाती है, जहाँ तारीख़ों के बोझ तले सच्चाई दबती चली जाती है। ‘अंजना’ पाठक को उन गलियों, चौपालों और अदालतों तक ले जाती है, जहाँ न्याय का सूरज देर से उगता है। यह कृति भारतीय संविधान के मूल्यों- बराबरी, स्वतंत्रता और गरिमा पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है। लेखक इस पुस्तक के माध्यम से सत्ता और समाज- दोनों से सीधे सवाल करते हैं। ‘अंजना’ केवल दर्द की कहानी नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है एक गाँव का, एक परिवार का और उस लोकतंत्र का, जहाँ आज़ादी और बराबरी के सपनों के बीच अब भी गहरा सन्नाटा मौजूद है।

लेखक परिचय
अंकित पचौरी मध्यप्रदेश के पत्रकार व लेखक हैं। वे हिंदी समाचार पोर्टल द मूकनायक में उप-संपादक के रूप में कार्यरत हैं और दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों, संवैधानिक मूल्यों तथा सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर निरंतर ग्राउंड रिपोर्टिंग व लेखन करते रहे हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘आदिवासी रिपोर्टिंग’ को पाठकों और आलोचकों की सराहना मिली है।

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