वैदिक पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्णपक्ष की अंतिम तिथि को मौनी अमावस्या है। इसे माघी या मौनी अमावस्या भी कहते हैं। इस बार माघी अमावस्या 18 जनवरी को है। सनातन धर्म में मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने की परंपरा है। इस शुभ अवसर पर भक्त गंगा तट पर स्नान करते हैं, ध्यान करते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन गंगा में स्नान करने से जाने-अनजाने में किए गये पाप धुल जाते हैं। मां गंगा की कृपा भी भक्तों पर बरसती है। कुंडली में शामिल अशुभ ग्रहों से मुक्ति मिलती है।
इस अमावस्या को माघी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मौन व्रत करने का विधान है। इसके अलावा जप, तप और श्रद्धा अनुसार दान भी करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होती है।
। यह दिन सनातनियों के लिए व्रत, दान और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से अपनी भक्ति प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण दिन है।
मौनी अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व
मौनी अमावस्या का मूल तत्व धार्मिक और सांस्कृतिक आचरण है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवता पवित्र नदियों और संगमों में निवास करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। इसी कारण प्रमुख तीर्थस्थलों, विशेष रूप से गंगा के किनारे, स्नान और प्रार्थना करने के लिए भक्तों की बड़ी भीड़ देखी जाती है।
व्रत की शुरुआत सूर्योदय के समय पवित्र नदी या सरोवर में स्नान से होती है। इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू “मौन व्रत” या “मौन का संकल्प” है, जिसके द्वारा भक्त अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए आत्मचिंतन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन मन ही मन प्रार्थना करना अधिक फलदायी और शक्तिशाली माना जाता है।

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